2 869 855 libros electrónicos en 110 idiomas
¿No le conviene? No hay problema. Puedes devolver los artículos hasta 30 días
No se equivocará con un vale de regalo. El destinatario puede elegir cualquier producto de nuestra oferta.
Hasta 30 días para devoluciones
शिक्षा का अधिकार, हमारा मौलिक अधिकार और उसे घर-घर तक ले जाने हेतु जिन माध्यमों की आवश्यकता होती है उसमें से एक हैं शिक्षक अर्थात गुरु । हालाँकि, गुरु तो वह प्रत्येक व्यक्ति है जिससे हम शिक्षा ग्रहण करते हैं पर सरकार ने जिसे अपना ठप्पा लगाकर एक नाम दिया है, "वह है मास्टर" । आप, जब चाहे जहाँ चाहे, कठिन से कठिन या सरल से सरल, प्रत्येक काम के लिए इस प्राणी को अनुकूल पाएंगे । यह निर्भर करता है आप पर कि आप कैसे और किन परिस्थितियों में इन्हें अनुकूल समझते हैं । पढाई-लिखाई के अलावे जितने भी काम हैं उनको करने में इन्होंने निपुणता हासिल कर ली है । ऐसा भी नहीं है कि वे पढाना नहीं चाहते या इन्हें पढ़ाई से नफरत है लेकिन परिस्थितियों के बोझ ने इन्हें गुरु से मास्टर बना दिया । पेट की आग, कच्चा या पका खाना नहीं समझता वह तो आगे आने वाले निवाले को ही मुँह में डालता है । बेराजगारों की फौज की थाली में आया नियोजित मास्टर की नौकरी, वह भी बिना किसी मशक्कत के, भला इस अवसर को कौन चूकना चाहता । न उम्र की सीमा न परीक्षा का बंधन, नंबर लाओ नौकरी पाओ की होड़ चली । पिता-पुत्र दोनों एक साथ मास्टर बनने के लिए कतारबद्ध थे । नौकरी तो मिल गयी पर परिणाम हुआ शिक्षक और गुरु, चारहजरिया, पाँचहजरिया और बकरचरबा मास्टर से मास्टरबा बन गए । यह पुस्तक है शिक्षा और तंत्र के उस परस्पर तालमेल का जिसने शिक्षा को उस गर्त में पहुँचा दिया है जहाँ से निकलने में शायद वर्षों लग जाए । अब आपको निर्णय करना है कि इसके लिए कौन दोषी है शिक्षक, समाज, सरकार या आप स्वयं ?
¡Hola! Soy Libroamiko, tu asesor de libros.
¿Cómo puedo ayudarte?