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शेख़ा लतीफ़ा दुबई की एक शहज़ादी का नाम भर नहीं है, न ही यह केवल उसकी व्यथा और उत्पीडन की कहानी है. उसकी और उसकी बहन शेख़ा शम्सा की कैद ये कहानियाँ हैं दुबई जैसे आधुनिक कहे देश के दकियानूसी शासक की गैर-ज़िम्मेदार और गैर-कानूनी आपराधिक हरकतों की. उन हरकतों की जिसे आज के सभ्य समाज में बेहद आपत्तिजनक, उत्पीड़क और निजता के अधिकार पर अतिक्रमण और स्त्रियों के प्रति एक घटिया सोच के रूप में देखा जाता है. इस आपत्तिजनक व्यवहार की पुष्टि अगर संयुक्त राष्ट्र भी कर दे, तो क्या शेष बचता है?
इस मामले को लेकर दुबई के इस शासक, प्रधानमंत्री और संयुक्त अरब अमीरात के उपराष्ट्रपति शेख़ मुहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की बेफिक्री का अलग ही आलम है. वह, उनकी सरकार, और उनके समर्थक इसे 'नितांत निजी मामला' बताते हैं, जिसमें न किसी संस्था के हस्तक्षेप की ज़रूरत है, और न ही किसी इंसान के'. वह इस सबसे बेपरवाह है, इतना बेपरवाह कि किसी न्यायिक प्रक्रिया और दूसरे देश की उस पुलिस को, जिसके कार्यक्षेत्र में ये घटनाएँ घटी हैं, उन्हें इन मामलों में पूछताछ करने तक का हक़ नहीं है. वह लगभग हर दिन इन्स्टाग्राम का अपना अकाउंट अपडेट करने का समय निकलता है, अपनी विभिन्न मुद्राओं और अवसरों की फोटो पोस्ट करता है, यहाँ तक कि प्रेम, धमकी और विरह की कविताएँ भी लिखा करता है, पर अपनी बेटियों की कैद को 'निजी' मामला कह कर उस पक्ष से मुंह मोड़ लेता है. उसके सामने विश्व के सभी मानव अधिकारों की संरक्षा में लगे संगठन, यथा एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देश भी बौने हैं, क्योंकि वह उनकी चिंताओं के प्रति खुद की जवाबदेही नहीं मानता है.
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